सोमवार, 15 अगस्त 2016

न्यूयॉर्कर बिहारी का पंद्रह अगस्त..


अगस्त 15 2016, 9:18pm

आज शाम घर जाते समय एम्पायर स्टेट बिल्डिंग को हिंदुस्तानी रंग में रंगा देखकर बड़ा अच्छा लगा और अगले रविवार को इंडो-अमेरिकन फेडरेशन के द्वारा आयोजित परेड न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर पार्क से निकाली जाएगी। इस बार बाबा रामदेव मुख्य अतिथि हैं, और शायद अभिषेक बच्चन भी आने वाला है लेकिन उनके साथ कई और अतिथि, बॉलीवुड सबका जमावड़ा होगा। यहाँ हर देश के नागरिक स्वतन्त्र हैं और अपने त्यौहार और अपने राष्ट्रीय दिवस मनाने के लिए। कल जब जर्सी सिटी में परेड निकाली गयी तब उसमें जय श्री राम, हरे कृष्णा और जय हिंद के उद्घोषों का समावेश था। यहाँ धर्म और राष्ट्र को एक ही तराजू में रख दिए जाने से कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि असल में सत्य सनातन संस्कृति ही तो भारत का प्राण मन्त्र है। बहरहाल भारत में शायद इस पर बवाल हो जाता, अपने यहाँ वोट बैंक की राजनीति नेता से लेकर जनता तक इस कदर हावी है कि क्या कहा जाए।

वैसे आज यहाँ ऑफिस में छुट्टी नहीं है लेकिन भारत में छुट्टी के बावजूद भी ऑफिस आने वाले आईटी मजदूरों को मेरा प्रणाम। आईटी के यह फौजी जो ऑफ-शोरिंग के नाम पर पूरी दुनिया को संभालते हैं वह भी बिना घड़ी देखे और बिना कोई तकलीफ के। दिवाली हो या दशहरा और या फिर पंद्रह अगस्त या फिर छब्बीस जनवरी। हर दिन, पूरी शिद्दत के साथ डटे रहते हैं और यही बैक ऑफिस सपोर्ट हमारी सर्विस इंडस्ट्री की रीढ़ है। यह फ़ौज की तरह है जो बड़े बैंको, कंपनियों को रात दिन सर्वर, डेटाबेस और विण्डोज़ टेक्नीकल सपोर्ट देते हैं और ऑन शोर के मैनेजरों के लिए यह किसी मजदूर से ज्यादा नहीं होते या यूँ कहिये तो उतनी इज़्ज़त नहीं पाते जितने के वह हक़दार होते हैं।

चलिये मेरी ट्रेन घर पहुंची... आप लोगों के लिए यह फोटो....



बुधवार, 3 अगस्त 2016

अनजान रास्तों पर पूरे कॉन्फिडेंस के साथ.. मोबाइल नेविगेशन ज़िंदाबाद


भारत में ड्राइव करना और अमेरिका में ड्राइव करने में कई बुनियादी अंतर है... भारत में बाएं चलने की आदत होने के कारण शुरूआती समय में दिक्कत हुई लेकिन फिर धीरे धीरे अभ्यस्त होने के बाद ठीक हो गया। वैसे भी आजकल गूगल मैप लेन गाइडेंस, रियल टाइम अपडेट के साथ ट्रैफिक की स्थिति, ट्रैफिक जाम होने पर वैकल्पिक रास्ते की भी जानकारी दे देता है और बहुत उपयोगी होता है। मैंने पहली बार मोबाइल मैप 2006 में इस्तेमाल किया था और नेविगेशन का उपयोग करना 2007 में शुरू किया था उस समय नोकिया मैप्स और गूगल मैप्स अपने आरंभिक दौर में थे, और गूगल के लैटिट्यूड ने भी अपनी लोकेशन को साझा करने और नेविगेट करने में बहुत मदद की थी। जब हम भारत भ्रमण पर थे तब इसी लोकेशन शेयरिंग के कारण शिवम भैया की मैनपुरी की उन घनघोर गलियों में भी आसानी से पहुँच गए थे। यहाँ अमेरिका में तो गाड़ी चलाने के लिए बड़ा सोच विचार करना पड़ता है, गाड़ी को कब, कहाँ और कैसे, किस लेन में रखनी है और कितनी स्पीड पर रखनी है इन सभी के लिए नेविगेशन परम आवश्यक हो जाता है।

मुझे मोबाइल नेविगेशन के लिए तीन मुख्य एप्पलीकेशन पसंद आते हैं: गूगल मैप, नोकिया या हियर मैप(ऑफ लाइन नेविगेशन की सुविधा के साथ) और तीसरा वेज़(Waze). वेज़ से मेरी दोस्ती हाल फिलहाल ही हुई है और यह मुझे बड़ा पसंद आया है। इसमें सोशल नेटवर्किंग की ही तरह गड्ढे, सड़क के जाम, कोई ट्रैफिक हादसा सभी जानकारी साझा कर सकते हैं और अपने रास्ते पर चलने वाले लोगों की मदद ले सकते हैं और उनकी मदद कर सकते हैं। नोकिया हेअर मैप्स तो विमान में बैठे हुए भी लोकेशन दिखा रहा था, यह देखिये उदाहरण के लिए:
वेज़ की स्थिति तो एकदम मजेदार होती है, जैसे कि अभी इस समय रात के साढ़े ग्यारह बजे भी मेरे घर के आसपास के ट्रैफिक की स्थिति देखिये:
न्यूयॉर्क जाने के लिए लिंकन टनल में ट्रैफिक जाम को बताते वेज़ के सोशल नेटवर्किंग  

इनके अलावा भारत में मैंने sygic का बहुत उपयोग किया है, त्रिविमीय आकृतियों से सुसज्जित यह बड़ा ही अच्छा एप्पलीकेशन है। इसकी सिर्फ एक दिक्कत है वह बैटरी, सो कर में अगर चार्जर है तो आप बड़े ही मजे में घूम सकते हैं। यह स्पीड अलर्ट भी देता है जो बहुत उपयोगी है।
स्पीड अलर्ट के साथ 
1612 किमी चलने के बाद भी पूरे मजे से.....



इसके अलावा आजकल गाड़ी में लगे लगाए नेविगेशन के भी अच्छे कण्ट्रोल हैं लेकिन वह मुझे बड़ा ही सीमित और बेवकूफ किस्म का लगता हैं। उसके ऊपर भी गाड़ी के निर्माताओं की बेवकूफी से भरी नीति है जो मैप के नए अपडेट के लिए आपको दौड़ाते रहते हैं। जेब में पड़ा हुआ आपका मोबाइल और पर्सनल नेविगेशन इस झिकझिक की तुलना में काफी अच्छा है। सो बस इनस्टॉल कीजिये और मजे से निकल पढ़िए, अनजान से रास्तों पर पूरे कॉन्फिडेंस के साथ :) :)

चलिए लगे हाथो इनको डाउनलोड करने की लिंक दिए देता हूँ:

एंड्राइड:
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sygic.aura
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.waze
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.here.app.maps
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.google.android.apps.maps

(इस पोस्ट के सभी चित्र मेरे मोबाइल से लिए हुए हैं और सभी मेरे किसी न किसी यात्रा के अनुभव हैं)

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

हिन्दू धर्म, आध्यात्म और हम

मेरे न्यूयॉर्क ऑफिस में एक व्यक्ति उसी गाँव का है जहाँ से मदर टेरेसा हैं, वह अति मधुर स्वभाव का और भारतीय संस्कृति के प्रति बहुत आदर स्वभाव रखने वाला व्यक्ति ज़ेवियर मुझसे बहुत सी बातें करता है। लगभग साठ वर्ष की आयु होने के बाद इन सभी की जानकारी लेना और संस्कृतियों के बीच के अंतर को समझने का उसका प्रयास मुझे बहुत अच्छा लगा। कल ज़ेवियर ने पूछा, आखिर इतने धर्मो के बावजूद भारत में कभी कोई धर्मयुद्ध क्यों नहीं हुआ, अब छोटी मोटी घटनाओं को यदि नज़रअंदाज़ किया जाए और यदि हम एक आम भारतीय के मत को जाने तो हम समझ सकते हैं कि आम तौर पर भारतीय सहिष्णु, देश के प्रति थोड़े से लापरवाह किन्तु सुषुप्त अवस्था में बहुत ऊर्जा समेटे हुए हैं। भारतीय हनुमान के समान हैं जो अपनी शक्ति का स्मरण स्वयं नहीं कर पाते परंतु जब उन्हें कोई प्रेरित करता है (अच्छी या बुरी ओर) तो वह क्रांति को तत्पर हो उठते हैं। मैं स्वयं मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ और मदर टेरेसा के काम काजी तरीकों का आलोचक हूँ और मेरे विचार से इस संगठन की गतिविधियों पर निगरानी होनी चाहिए, ख़ास तौर पर धर्मान्तरण पर। विश्व समुदाय और वेटिकन सिटी दस-चालीस की खिड़की में भारत को एक बड़े टारगेट के रूप में लेता है और भारत की वोट बैंक की राजनीति उसमे उसकी मदद करती है। कभी एनजीओ की आड़ में तो कभी चमत्कारों की आड़ में भोले भाले भारतीयों को मूर्ख बनाते हुए यह अजीब सी हरकतें करके भी पूर्व की भारतीय सरकारों के समर्थन से आज तक सक्रिय हैं। 

उसका एक और कारण यह है कि बहुसंख्यक हिन्दू असंगठित है और वह बहुत सी बातों से अनजान हैं। भारत में इन संगठनों के इतना सक्रिय होने की एक वजह यह भी है कि भारत हमेशा एक बहु-धार्मिक और सबको साथ लेकर चलने वाला सहिष्णु समाज रहा है। विश्व में जब सभी पंथो का यह मानना है कि उनके शास्त्र, बाइबल और क़ुरान इत्यादि ही अकेले और अंतिम सत्य का खज़ाना हैं और जो उनकी इस अनंत(?) सत्यता को नहीं स्वीकार करते उन्हें 'पगन' या 'काफिर' कहते हैं। उनके इस विचार से इतर हिंदू धर्म अन्य धर्मों को एक अलग पंथ की तरह देखता है और उनकी मान्यताओं में कोई अतिक्रमण नहीं करता। वह उनके साथ भी अपनी मौलिकता को बनाये हुए, वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ता रहता है। हिन्दू धर्म का दर्शन, अन्य धर्मों से थोडा अलग है क्योंकि यह मौलिक तौर पर आध्यात्म से जुड़ा हुआ और मानवीय मूल्यों और आदर्शों पर आधारित है। कर्मयोग सिखाती हुई गीता, मानवीय आदर्शों की रामायण, सांख्यिकी सिखाता हुआ सांख्यशास्त्र। गौर करने वाली बात यह भी है की भारतीय दर्शन के छः प्रकारों में से सांख्य भी एक है जो अद्वैत वेदान्त से सर्वथा विपरीत मान्यताएँ रखने वाला दर्शन है। इसकी स्थापना करने वाले मूल व्यक्ति कपिल कहे जाते हैं। 'सांख्य' का शाब्दिक अर्थ है - 'संख्या सम्बंधी' या विश्लेषण। इसकी सबसे प्रमुख धारणा सृष्टि के प्रकृति-पुरुष से बनी होने की है, यहाँ प्रकृति (यानि पञ्चमहाभूतों से बनी) जड़ है और पुरुष (यानि जीवात्मा) चेतन।योग शास्त्रों के ऊर्जा स्रोत (ईडा-पिङ्गला), शाक्तों के शिव-शक्ति के सिद्धांत इसके समानान्तर दीखते हैं। 

हिन्दू धर्म के मूल से परिचय के लिए सांख्यदर्शन के २५ तत्वआत्मा को समझना होगा, जो किसी भी मानव के लिए कुछ यूँ हैं: यह भागवत पुराण के श्लोक का ही अभिप्राय है:  

पंच महाभूत: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश 
पांच: तन्मात्र: गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द 
चार अंतःकरण: मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त 
पांच ज्ञानेंद्र: जीभ, नासिका, नेत्र, त्वचा और कान 
पांच कर्मेन्द्रियाँ : पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक

विज्ञान के तर्क और आज का मेडिकल साइंस सांख्य के इन सिद्धान्तों की ही बात को दोहराता दीखता है। मूल रूप से हिन्दू धर्म का विश्वास तर्क संगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्म से जुड़ा हुआ है इसमें किसी पर आक्रमण कर जैसा कुछ नहीं है। इतिहास से अधिक ऐतिहासिक (दस हज़ार वर्ष से अधिक) हिंदू धर्म के वेद इस बात को स्पष्ट रूप सेकहते है कि: "एकम सत, विप्रबहुधवदंति"- सत्य एक है लेकिन विद्वानों द्वारा इसकी व्याख्या विभिन्न प्रकार से की गई है। कई सिद्धान्तों के माध्यम से इस बात को समझाया गया है। मित्रों धर्म और आध्यात्म दो अलग अलग चीजें हैं, उसमे भी व्यक्ति के लिए आध्यात्म अधिक महत्त्व रखता है, उसके लिए धर्म दुसरे स्थान पर आता है। विज्ञान के तर्क, आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए कोई विरोधाभास नहीं करते। मित्रों आज जब विश्व समुदाय में कई वर्ग अपने अपने पंथ प्रचारक हर ओर भेजते हैं, वेटिकन सिटी ईसाइयत के प्रचार के लिए दुनिया भर में मिशनरी भेजते रहे हैं और आज भी उनका यह कार्यक्रम जारी है, आपने हिन्दू बहुसंख्यक नेपाल में भूकंप आने पर इन मिशनरीज़ को बाइबल देते हुए देखा है। यह कुतर्क करते पाये जाते हैं कि यीशु की पनाह में उन्हें मुक्ति मिलेगी और उन्हें हिन्दू धर्म को छोड़कर ईसाई हो जाना चाहिए। ठीक ऐसा ही मुस्लिम सूफी संत भी करते आये हैं जो पिछले बारह सौ वर्षों से भारत में हिन्दू धर्म को समाप्त करने और इस्लामीकरण के लिए प्रयासरत हैं। हिन्दू फिर भी सिर्फ अपने मूल आध्यात्मिक धारणा और योग सिद्धांत के कारण जीवित रहा, वह कभी काबुल में मस्ज़िद तोड़ने नहीं गया।

मैं यहाँ इतिहास की विवेचना करने या किसी की श्रेष्ठता सिद्ध करने नहीं, बल्कि विश्व में हो रहे धार्मिक कट्टरवादी उन्माद पर चिंतित हूँ। अपने मूल तत्व से भटकाते हुए कथित धर्म गुरु कभी कभी धर्म की मूल भावना से ही भटक जाते हैं। यहाँ धार्मिक गुरुओं की ज़िम्मेदारी है कि वह धर्म की मूल आध्यात्मिक धारणा पर बने रहे और वसुधैव कुटुम्बकम् की अभिधारणा को प्रचारित कर अतुल्य भारत को विश्वगुरु बनाने में योगदान दें। 

----------------------------------------------

(आज कल मैं भागवत और सांख्य का विद्यार्थी बनकर कुछ सीखने का प्रयास कर रहा हूँ, कुछ ब्लॉग पोस्ट्स के माध्यम से और भी बातें साफ़ करने का प्रयास करूँगा)

सोमवार, 21 मार्च 2016

बैठे ठाले...

चन्दन है इस देश की माटी तपोभूमि हर गाँव है... हर बाला देवी की प्रतिमा बच्चा बच्चा राम है। न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी के बीच की ट्रांस हडसन पाथ ट्रेन में नेटवर्क नहीं आता, क्योंकि ट्रेन भूमिगत रेल प्रणाली है और हडसन के तल के नीचे एक सुरंग से चलती है। मैं कान में हेडफोन लगाए संघ के गीत सुन रहा हूँ, जो शक्ति इन गीतों में है वह किसी और धिनचाक वाले कानफाडू गीतों में कहाँ?

ट्रेन में इस समय मेरे अलावा कोई भारतीय नहीं दिख रहा, सभी मुख्यतः अमेरिकी या अफ़्रीकी लग रहे हैं लेकिन सभी का मोबाइल में व्यस्त रहना और कॉमन है (मैं भी टीप टीप कर रहा हूँ सो मैं भी अपवाद नहीं)। कुछ बुज़ुर्ग लोग अखबार में व्यस्त हैं, शायद यहाँ की भी बुज़ुर्ग पीढ़ी अभी तक मोबाइल से न्यूज़ पढ़ने के लिए अभ्यस्त नहीं हुई है सो अखबार पढ़ रही है। एक दो महिलायें उपन्यास पढ़ रही हैं, उनमे से एक न जाने क्या पढ़ रही है क्योंकि कभी हंस रही है कभी गंभीर तो कभी ओह ओह कर रही है। पहली बार उसके यूँ आवाज़ निकालने से लोगों को अजीब लगा लेकिन अब सबको कोई फर्क नहीं पड़ रहा। हमारी विशेषता यही है न कि हम हर किसी को अपना लेते हैं। बहरहाल कल की बर्फ के बाद की ठंड ने थोड़ा परेशान तो किया ही है। मोटे मोटे जैकेट और मफलर कसे हुए लोगों को देखकर अजीब सा लगता है, पिछले हफ्ते जब पारा पचीस डिग्री पार गया था तब क्या गजब रंग बिरंगे लोग थे अब फिर से सब काला और ग्रे है। वैसे मौसम है, बदल ही जाएगा।

इस ट्रेन में मेरे सामने बैठे एक महिला ने कॉफ़ी का ग्लास फ्लोर पर रखा है लेकिन ट्रेन के चलने या रुकने से एक भी बूंद न छलका और न ही गिरा। वह कोई उपन्यास पढ़ रही है और बीच बीच में चुस्की लेकर रख दे रही है। इतना स्टेबिलिटी काश मुम्बई लोकल में होती तो मजा ही आ जाता, मुश्किल है लेकिन शायद अपने मेट्रो में भी ऐसा ही होता होगा।

मिडटाउन मैनहटन में 23 स्ट्रीट का मेरा स्टेशन आने को है और कान में बज रहा है, "होइहै सोई जो राम रची राखा, को करी तर्क बढ़ावहि साखा"... बस इसी सन्देश के साथ आज का दिन शुरू किया जाए... नया सप्ताह, सोमवार!!

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

हाउ कम इण्डिया!!

मेरे ऑफिस में मेरी डेस्क के अगल बगल एक चीनी और एक अमेरिकी है, चीन का प्राणी जब मौका मिलता है तक अमेरिका को कोस लेता है और अमेरिका वाला तटस्थ रहकर शांत रहता है। मैं भी तटस्थ ही रहता हूँ क्योंकि ऑफिस में क्या ही बोलना। एक बात पर इन दोनों की सहमति है और वह है फुटबॉल, दोनों का जूनून एक सा ही है। दोनों इंग्लिश प्रिमीयर लीग और अमेरिकी नेशनल फुटबॉल लीग बहुत मजे से देखते हैं और ऑफिस के टीवी पर सीएनबीसी की जगह फुटबॉल लगा लेते हैं।

इनके इस शौक में मैं भी मजे ले लेता हूँ क्योंकि थोड़ा बहुत ही सही फुटबॉल का शौक तो मुझे भी है ही। मेरे पापा फुटबॉल के अपने ज़माने के मशहूर खिलाड़ी थे और मौका न मिलने और कोई भी गाइडेंस न होने के कारण और सत्तर के दशक के उथल पुथल में बिहार में ज्यादा कुछ कर नहीं पाये। मैं आज भी फुटबॉल फॉलो करता हूँ लेकिन जूनून जैसा कुछ नहीं। बहरहाल यह दोनों प्राणी खूब मौज से फुटबॉल का मजा लेते रहे, इनसे गलती तब हो गयी जब इन्होंने कहा कि "एनएफएल इस रिचेस्ट बोर्ड"। मैंने कहा भाइयों एक बार गूगल करके तो देखो, फिर बताओ कौन है। दोनों ने गूगल किया और जवाब आया बीसीसीआई, अब इनकी हैरानी। मुझे पूछे यह बीसीसीआई क्या है, हम बोले भारतीय क्रिकेट बोर्ड। इन्होंने बोला लेकिन क्रिकेट देखने और खेलने वाले देश ही कितने हैं, न अमेरिका क्रिकेट खेलता है न चीन। हम बोले गूगल कर लो न, बेचारे थोड़ा सा घबरा गए जब कहीं यह देख लिए की, भारतीय क्रिकेट टीम सबसे महँगी फ्रेंचाइजी है, आईपीएल दूसरा सबसे बड़ा क्लब स्पोर्ट है और बीसीसीआई सबसे अमीर खेल बोर्ड है। उन दोनों का ही रिस्पांस था, "हाउ कम इण्डिया"... हा हा, मुझे बड़ा मजा आया फ़िलहाल..

बहरहाल इसमें गलती इनकी नहीं थी, उन्होंने भारत के बारे में सोचा ही नहीं होगा कभी, सोचते भी कैसे.... वैसे भारत के बीसीसीआई को इतना अमीर बनाने में हम सभी का योगदान है, इसके इतने पॉपुलर होने से बाकी खेल लगभग बर्बादी की कगार पर हैं, आज खुद ही देखिये....

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

अलविदा अन्ना भैया...

अपना कौन पराया कौन, अपनों ने वनवास दिया श्री राम को सरजू पार और पराया था जो केवट, बन गया जीवन की पतवार। कोई मन में रहकर मन के सौ सौ टुकड़े कर जाए, कोई मन से दूर हो फिर भी यह मन सुख से भर जाए। राजश्री की फ़िल्म इसी लाइफ में का यह गीत, अभी एक ऑनलाइन रेडियो पर सुना। वाकई यह बात सच ही है, कभी कभी अपने खुद के रिश्ते बहुत तकलीफ देते हैं और कोई ऐसा व्यक्ति जो हमारा कोई नहीं लेकिन वह मार्गदर्शक बन जाता है। हिन्दी ब्लॉगिंग से मेरा कुछ ऐसा ही रिश्ता है, यहाँ मुझे पूरा परिवार मिल गया। भैया, भाभी, दीदी, कितने प्यारे छोटे भाई बहन और न जाने कितने ऐसे अनजान लोग जो भले कभी हमसे मिलें न हों लेकिन फिर भी हमारे अपने ही हैं। हिन्दी ब्लॉगिंग के शुरूआती दिनों वर्ष 2003/2004 और 2005 के समय में जब यूनिकोड टाइपिंग नहीं थी और हम सीखने सिखाने में ही अपना समय बिता रहे थे, तब के साथी आज तक अटूट हैं।

जब मैं अमेरिका आया और मनीषा कन्फ्यूज़ थी कि कैसे सब होगा, मैंने पुरी कॉन्फिडेंस से कहा, अभिषेक है स्तुति है कोई दिक्कत नहीं होगी। और वाकई मेरे इन दोनों भाई, बहन ने बहुत मदद की है। शिवम भैया, प्रशांत, शेखर, सलिल दादा, अर्चना दीदी, रश्मि दीदी, अपने राजा भैया, अजय भैया, उड़न दद्दा, ललित दादा, महफूज़ भाई, प्रवीण भैया से लेकर संतोषजी तक सभी ने मेरा मार्ग दर्शन ही किया है। ऐसे कई और नाम हैं जो अभी स्मृति पटल पर नहीं आ रहे लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग के साथियों ने हमेशा मेरा साथ दिया है।

आज अन्नाभाई अविनाशजी के चले जाने से यह परिवार को बहुत गंभीर क्षति हुई है। हिन्दी ब्लॉगिंग का एक बहुत पुराना साथी, शिक्षक, मार्गदर्शक, व्यंग्यकार अंतिम यात्रा पर। यह बात बहुत विचलित कर गयी। आज सुबह सोकर उठते ही शिवम भैया का सन्देश देखा और मन उदास हो गया। मेरी अन्ना भैया से कई बार फोन पर बात हुई, मुलाक़ात हालाँकि एक दो बार ही हुई लेकिन परिचय बना रहा। व्यंग्यकार के साथ ज़िन्दगी ने बहुत बड़ा व्यंग्य किया, लेकिन उनका यूँ ही चले जाना धक्के जैसा है। ईश्वर के पास भी हमारे अन्ना भैया वही चिरपरिचित अंदाज़ में डोरी वाला चश्मा लगाए कोई व्यंग्य ही कह रहे होंगे.....

अलविदा अन्ना भैया...

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

गिलास के आधे भरे या खाली होने का समाजशास्त्र


हम अक्सर पॉजिटिव एटिट्यूड या सकारात्मकता पर कई लोगों को भाषण देते हुए सुनते हैं। खुद मोदी भी कई बार आधे भरे या आधे खाली पर काफी बार बोल चुके हैं। मेरी समझ में इस आधे खाली या आधे भरे हुए का भी अपना एक समाजशास्त्र है। यह खाली वह तबका है जो आज़ादी के लगभग अड़सठ साल बाद भी भूखा है, मूलभूत सुविधाओं से लाचार है। यह भारत का वह वर्ग है जो झुग्गियों में, नालों के किनारे, सड़क और फुटपाथ पर भूखा और नंगा है। इसके लिए शिक्षा, राजनीति, सुधार, बदलाव और बड़ी बड़ी बातें कोई मायने नहीं रखती हैं और इसके लिए सिर्फ सो वक्त की रोटी कैसे हो वह ही सबसे गंभीर चुनौती बन जाता है। अपने हिस्से के इस आधे खाली गिलास को देखकर वह हैरान है। उसे दिख रहा है कि दूसरी तरफ का गिलास लबालब भरा है लेकिन वह तो उसके हिस्से का है ही नहीं। वहीँ दूसरी तरफ के आधे भरे गिलास की तरफ नज़र डालिये तो वह चकाचौंध से भरी हुई पांच सितारा संस्कृति से भरपूर इण्डिया है। यह वीकेंड आने पर खुश होता है, पार्टी करता है, मॉल में सिनेमा देखता है, मोबाइल तकनीक का भरपूर उपयोग करता है, उपग्रह, चाँद और मंगल की बातें करता है। यह वैश्विक रूप में भारत का ब्रांड इण्डिया बनाने के लिए एक प्रचार सामग्री की तरह दिखाया जाता है। यहाँ मैं किसी वामपंथी की तरह फालतू की संवेदना नहीं परोसना चाहता लेकिन मैं एक ध्यान दिलाना चाहता हूँ, इस खाली और भरे हुए गिलास के बीच के सन्नाटे की ओर। आज़ादी के अड़सठ साल बाद भी लगभग बाइस करोड़ लोग इसी खाली गिलास की तरफ हैं। यह कहीं किसी राजनैतिक दल के वोट बैंक हैं, जो जानबूझकर इन्हें गरीब और निर्धन बनाये रखना चाहते हैं क्योंकि यदि वह सबल हो गए तो इनकी राजनीति कैसे चमकेगी। 


मित्रों, एक बात ध्यान से देखिये: विश्व का सबसे बड़ा स्लम "धारावी" मुम्बई के उपनगरीय तंत्र का एक अहम हिस्सा है। इसमें विश्व का सबसे बड़ा चमड़े का कारखाना है, यहाँ जूते, जैकेट, बेल्ट और भी न जाने क्या क्या बनाया जाता है। कांग्रेस के औद्योगीकरण में बड़े व्यापारियों को लाभ पहुंचाने के नाम पर इन छोटे और मंझोले उद्यमियों को बहुत नुकसान हुआ। पर्यावरणविद भी इको-सिस्टम का नाम लेकर इन्हें कोसते रहे लेकिन कभी किसी ने इन्हें कहीं और बसाने और इस उद्योग में एसएमई बनाने की वकालत नहीं की। मोदी का स्टार्ट-अप इण्डिया का मैं पुरज़ोर समर्थन करता हूँ क्योंकि इसके बाद विश्व में भारत की एक अच्छी क्षवि बनेगी और कई कंपनियां आएँगी। हर क्षेत्र में बहुत स्कोप है, चाहे वह कचरे के रीसायकल का हो या फिर जैविक खाद बनाने का, सोलर प्लांट का हो या फिर कुछ और। आपको हैरानी होगी यह सुनकर लेकिन गोबर के कंडे बनाकर उनका निर्यात संभव है। इस भरे हुए गिलास और आधे खाली गिलास के बीच के सन्नाटे को दूर करने के लिए ज़रूरी है कि इस वर्ग को मजबूत किया जाए। उसे आरक्षण का लपूझन्ना नहीं अवसर चाहिए। थोड़ी सी पूँजी और दिशा चाहिए। सरकारी तंत्र भी उसके लिए अनुकूल हों, पुलिस प्रशासन माफिया से उनकी रक्षा करें ताकि वह अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इस साठ साल के कांग्रेसी राज की वोट बैंक राजनीति ने किसी भी समस्या के समाधान के बारे में न सोचकर सिर्फ वोट बैंक की राजनीति की मानसिकता ने बहुत मुसीबत कर दी है, तंत्र ही भ्रष्ट है और अब यही भ्रष्ट आचरण हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। यकीन न आये तो खुद के गिरेबां में झाँक लीजियेगा, समझ जाइयेगा।

बहरहाल चिंता ज़रूर कीजिये लेकिन भली प्रकार से बुद्धि के तर्क को ध्यान में रखकर, लीजिये चाय पीजिये तब तक। वैसे इस समाजशास्त्र से इतर यहाँ आधी रात हो रही है और हम तारों सितारों की ओर टकटकी लगाये हुए हैं, कैमरे से किसी चमकते हुए तारे की फोटो, चन्द्रमा की फोटो खींच खींच कर खुद को ही खुश कर रहे हैं। धीमी धीमी आवाज़ में कंप्यूटर गीत बजा रहा है की वह सुबह कभी तो आएगी। 



चलिए आप एक प्याली कप और चंदा मामा की फोटो देखिये और हमें इजाजत दीजिये, कल सुबह फिर से नौ से छ की गुलामी करने जाना है। 

बुधवार, 20 जनवरी 2016

ब्रम्ह सत्यम जगत मिथ्या


एक बार नारद आकाश मार्ग से कहीं चले जा रहे थे, उन्हें रुदन करता और बहुत ही घबराया, डरा हुआ एक पक्षी दिखाई दिया। उस जीव की इस दशा पर उन्हें बड़ी दया आई सो वह उसके पास गए और उसकी इस अवस्था का कारण पुछा। उस कबूतर ने बताया कि नित्य की भाँति आज वह अपने परिवार के लिए अन्न संग्रह कर रहा था तो ठीक उसी समय काल ने उसे देखा और उसे देख कर काल ज़ोर से हंसा। उसी काल के हंसने से वह आक्रान्त था कि निश्चित ही उसका अंत अब सुनिश्चित है। उसने नारद के चरणों में गिरकर अपने लिए अभय माँगा। नारद ने दया करते हुए उसे अपनी मन्त्र शक्ति से हज़ारो कोस दूर हिमालय की कंदराओं में पहुंचा दिया। नारद अपने इस प्रयास से स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे और उसी अभिमान में वह काल से जा मिले। वह काल उसी कबूतर को अपने साथ लिए जा रहा था और कबूतर अब जीवित न था। जिस कबूतर के अभय के लिए नारद ने ऐसा प्रयास किया उसे असफल देख नारद को घनघोर निराशा हुई। नारद ने काल से पुछा कि यह कैसे हुआ तो काल बोला, हे मुनिराज, आज जब मैंने इस पक्षी को अन्न संग्रह करते हुए देखा तब मैं इसलिए हंसा क्योंकि विधाता ने इसकी मृत्यु का समय और स्थान अबसे कुछ पल बाद हज़ारो कोस दूर हिमालय की कंदराओं में लिख रखा है और यह अभी यहीं है। मैं यह सोच कर विधाता पर हंसा कि इतनी जल्दी यह अबोध पक्षी वहाँ पहुँचेगा कैसे? लेकिन आपने मेरा काम आसान कर दिया और इसे अपनी मन्त्र शक्ति से इसके प्रारब्ध तक पहुंचा दिया। विधाता ने प्रत्येक प्राणी के जीवन, मरण का समय निश्चित किया है और हर प्राणी अपने अपने कर्मानुसार उसी गति को प्राप्त होते हैं।

इसके बाद नारद अचेत हो गए, उन्हें हत्या के पाप जैसा बोध होने लगा और वह इसी पाप के प्रायश्चित के लिए नारायण के पास पहुँचे। करुणासिंधु भगवान ने नारद को संसार के चक्र का गूढ़ रहस्य बताया, "न कोई आता है, न कोई जाता है, यह संसार, उसकी हर एक गतिविधि, प्राणी, जीव, चर, अचर, सजीव, निर्जीव, सभी योनियों के सभी चक्रों और यहाँ तक कि काल को संचालित करने वाली शक्ति परमात्म ही है"। रामायण भी कहता है कि "होइहै सोई जो राम रची राखा, कोई करि तरक बढ़ावहि साखा"। मित्रों सो इस प्रेरक कथा से प्रेरणा लीजिये और अपने जीवन में नकारात्मकता को निकाल कर आगे की सुधि लेना ही ठीक है।

आज का ज्ञान यहीं तक, कल देव बाबा कोई और ज्ञान देंगे। 😊😊

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

मुंबई ... मेरी जान : भाग-2

मुंबई में मेरे संघर्ष के दिनों में कई मित्र बनें, उन्ही में से एक थे गौरव सूद। गौरव और अंजुम और हमारी प्यारी बिटिया शरण्या। न जाने कितने ही ट्रिप पर हमारा साथ रहा और न जाने कितने हज़ारों किलोमीटर हमारी बक बक झेली है गौरव और अंजुम ने। आल्टो से लेकर रिट्ज और फिर डस्टर तक हमने कई मील साथ रास्ता तय किया है। वैसे गौरव के साथ मेरी पहचान एक अजीब से वाकये के दौरान हुई थी। दर-असल उन दिनों हम दोनों ही नौकरी की तलाश में मारे मारे  घूम रहे थे और इन्ही वाक-इन के चक्कर लगाते हुए बेरोज़गारों की कतार में दो नौजवान आपस में टकरा गए। पहला राउंड हो चुका था और हम दोनों ही थके हुए थे, मुझे कहीं बैठने की जगह नहीं मिल रही थी और गौरव भाई अपनी मित्र मण्डली के साथ बैठे थे। मुझे यूँ ही अस्त-व्यस्त सा देखकर गौरव भाई ने कहा, "मेरे भाई आ जाओ" और मैं बस इसी आत्मीय आवाज़ से गौरव भाई के पास आ गया। बहरहाल वाक-इन से दोनों धक्के खा कर अपने अपने रास्ते मुंबई आ गए और दोनों का ही कहीं नहीं हुआ। मोबाइल को हम दोनों के पास ही नहीं थे सो ईमेल की अदला बदली हो गयी। दिन बीते, कई महीने बीते और फिर नौकरियां मिली, अपने अपने रास्ते दोनों की ज़िन्दगी चलती रही और इसी बीच मेल की अदला बदली होती रही। फिर हम पडोसी बने, साथ साथ एक कंपनी के काम किये, एक दशक से अधिक की दोस्ती आज भी यूँ ही है। आज बड़ी याद आ रही थी गौरव और अंजुम तुम दोनों की तो यूँ ही कुछ चित्रों को संजो पर यह पोस्ट लगा दी गई। आइये आप भी हमारे गौरव बाबा जी के दर्शन कीजिये। 







वैसे आज हमारे गौरव भाई टोक्यो में हैं और मैं अमेरिका में, चौदह घंटे का समय अंतराल है लेकिन हैं बस एक पिंग दूर। 

आज की पोस्ट इतनी ही, अगली पोस्ट में भी मुंबईनामा जारी रहेगा अभी कुछ दिन और :-) 

सोमवार, 4 जनवरी 2016

मुंबई ... मेरी जान : भाग-1

आज यूँ ही ट्रेन में आँख लग गयी और महज़ पंद्रह मिनट में बैठे बैठे सोते हुए मैं चेम्बूर पहुँच गया वह भी वर्ष 2001 की जनवरी, जब पहली बार मुंबई गया था। चेम्बूर मुझे गीत "दो दीवाने शहर में" के अमोल पालेकर सरीखी अनूभूति दे रहा था। मैं देवनार और चेम्बूर के पास आरके स्टूडीओ देखकर ऐसा महसूस कर रहा था मानो मैं राजकपूर की फ़िल्म का ही कोई पात्र बन बैठा हूँ। बेस्ट की लाल बस में जब पहली बार बैठा तो लगा अब "छोटी से बात" फ़िल्म के अमोल पालेकर साहब की तरह किसी हसीना का पीछा करूँ.... लेकिन असल में महानगर में किसी अवसर की तलाश में आया एक नवयुवक, मैं अपने आप में उलझा हुआ सा था और किसी से कुछ भी पूछने में बड़ा संकोच हो रहा था। दर-असल उन दिनों मैं रेलवे की किसी परीक्षा देने गया था, शायद असिस्टेंट स्टेशन मास्टर के लिए। और शायद किसी बैंकिंग की परीक्षा के लिए जुहू के पंजाब नेशनल बैंक शाखा में कोई चालान बनवाना था। बहरहाल बेस्ट की बस से यात्रा करना मेरे लिए बहुत रोमांचक अनुभव था। मैथिली, भोजपुरी और हिंदी भाषा में पढ़ाई करने वाले को मराठी भाषियों के साथ थोड़ी असहजता तो थी ही लेकिन हिंदी सब समझ रहे थे तो ठीक ही था। मेक की बात यह कि जिस शब्द को मैंने सबसे पहले सुना, वह था "पुढ़े चला" इसका अर्थ है "आगे बढ़ो"। लॉजिकल बुद्धि से चलते हुए मैंने सायन के किसी कालेज में रेलवे की परीक्षा दी और फिर शाम को वापस आ गया था। पहला दिन एक बड़े शहर में बहुत अजीब सा था। 

भैया ने बहुत समझाया था लेकिन जब तक आप ख़ुद नहीं झेलते तब तक बहुत सी बातें समझ में नहीं आती हैं। सो सेंट्रल, हार्बर और वेस्टर्न लाइन मुझे कुछ भी समझा नहीं था। जुहू जाना था और वह भी ट्रेन से, उसके बाद भी जुहू पश्चिम में बैंक जाना किसी बड़े प्रोजेक्ट सरीखा था।  पूछ पूछ कर मानख़ुर्द, चेम्बूर से सायन फिर दादर और फिर जुहू जाने के लिए फ़ास्ट लोकल की झंझट, जुहू की जगह अंधेरी पहुँच गए थे और फिर पूछ पूछकर वापस स्लो लोकल पकड़कर जुहू-विले पारले पहुँचे। लोकल ट्रेन को पहली बार देखना अपने आप में बहुत बड़ा अजूबा था, एक ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म के जनसमुदाय को लील गयी और जिस प्लैट्फ़ॉर्म पर हज़ारों लोग थे वह सभी एक पल में ट्रेन में समा गए। धक्कम धक्का, रेलम पेल, भीड़ ही भीड़, सभी अपने आप में उलझे, सब कहीं न कहीं व्यस्त। ट्रेन में कोई दरवाज़े के पास खड़ा होकर वर्ग पहेली हल कर  रहा था तो कोई भजन कीर्तन में व्यस्त था। ग़ज़ब अनुभव था यह!! बहुत ही कनफ़्यूज सा दिख रहा मैं, सभी कोई लग रहा होगा कि शहर का नया पंछी है। बहरहाल, उस समय में मोबाइल नहीं होते थे और नेविगेशन के लिए देसी फ़ॉर्म्युला इस्तेमाल में आता था सो हमने भी उसी को अपनाया और पूछ पूछ कर पहले ईस्ट गए उसके बाद फिर वेस्ट आए। उसके बाद रास्ता खोज ही रहे थे कि क़ेराकत जौनपुर के एक रिक्शे वाले भैया से मुलाक़ात हो गयी। वह पहचान गए कि रास्ता खोजते और यूँ ही भटकने वाले इस प्राणी को मंज़िल नहीं मिल रही। मैं भी बहुत जल्दी लोगों पर भरोसा करने वाला हूँ सो हमारी ख़ूब बात हुई, इन शख़्स ने मुझे ईस्ट और वेस्ट का लॉजिक समझाया(मुंबई के पश्चिम उपनगर में अगर आप प्लैट्फ़ॉर्म-१ से बाहर निकलेंगे तो वह पश्चिम होगा, केवल मानखुर्द में ही उत्तर/दक्षिण)। ज़ुहु पश्चिम में घूमते हुए, अमिताभ बच्चन से लेकर न जाने कितने स्टार्स  के घर दिखाते रिक्शे वाले भाई मुझे पंजाब नेशनल बैंक ले आए, फिर वही बोले कि जाओ, यह पर्सनल ब्रांच है सो दस मिनट से ज़्यादा टाइम नहीं लगेगा। और वाक़ई दस मिनट में काम हो गया फिर वही मुझे स्टेशन छोड़ आए, रास्ते में वड़ा पाव और जूस भी पिए हम दोनों... और न जाने क्या क्या बात हुई। शायद मेरे मूली, मक्का और मक्कारी वाली बात कहने पर वह बहुत जल्दी कनेक्ट कर पाया था, उसे लगा कोई गाँव  घर का ही आदमी मिला है। मुंबई शहर में मेरे उन दिनों के अनुभव के समय मैंने नहीं सोचा था कि मैं कभी वापस मुंबई आऊँगा, लेकिन मैं वापस न सिर्फ़ मुंबई आया बल्कि इस शहर ने मुझे हर वो मौक़ा दिया जिसकी मुझे ज़रूरत थी। 

मुंबई मेरे विचार से भारत का असली मेट्रो शहर है, यहाँ कुछ भी पहनो, कहीं भी चले जाओ, आधी रात में भी बिना किसी दिक़्क़त और डर के बिंदास घूमो। मैं कई बार मुंबई आधी रात के बाद उतरा हूँ और कभी भी एयरपोर्ट हो या स्टेशन से आराम से घर पहुँचा हूँ। यह सुरक्षा की भावना मुझे कभी दिल्ली, कलकत्ता या चेन्नई में नहीं दिखी। एक ठेलेवाले से लेकर टाटा अम्बानी तक, हर कोई अपने काम में व्यस्त है। ट्रेन में भी कोई पढ़ाई कर रहा है, कोई वर्ग पहेली हल कर रहा है तो कोई अख़बार खोल कर बैठा है। मुंबई से अपरिचित मेरे मित्रों को यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लगे लेकिन मुंबई की विविधता का अंदाज़ा किसी भी अख़बार के स्टाल को देखकर लगाया जा सकता है, हिंदी - अंग्रेज़ी - तमिल - तेलगु - मलयालम - कन्नड़ - बंगाली - गुजराती - भोजपुरी - उड़िया जो भाषा कहिए उसके समाचार पत्र दिख जाएँगे। मुंबई मुंबई थी और है, कोई भी शहर इसकी बराबरी नहीं कर सकता। आज यहाँ जब विश्व के सबसे बड़े शहरों में से एक न्यूयॉर्क को देखता हूँ तो मुंबई के प्रति मेरा लगाव और गहराता जाता है..... कंकरीट के जंगल तो यहाँ भी हैं लेकिन वैसी जीवंतता को अभी भी तलाश रहा हूँ..... देखते हैं, शायद पढ़े लिखों के शहर में कोई जाहिल मिल जाए.... 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

रूपया, रुपया, रुपया

वायदे के मुताबिक़ आइये आज हम फॉरेन एक्सचेंज या फिर मुद्रा विनिमय दर की बात करते हैं। आखिर यह होता क्या है और इसका किसी देश की अर्थव्यवस्था से क्या लेना देना है। आज जब भारत दुनिया की सातवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और ख़रीदी क्षमता के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तब ऐसे में रूपये की कीमत आखिर तय कैसे होती है और कौन कौन से कारक या कारण हैं जिनके कारण इसकी कीमत में उतार या चढाव होते हैं। सबसे पहले समझने का प्रयास करते हैं की मुद्रा क्या है। मुद्रा वह है जिस से दैनिक जीवन में ख़रीद और बिक्री होती है, उदाहरण के लिए अगर आपको बाज़ार से कुछ खरीदना है तो फिर आप उसकी कीमत की मुद्रा देकर चुका सकते हैं। इसमें धातु के सिक्के और काग़ज़ के नोट दोनों आते हैं। किसी भी देश की मुद्रा को उस देश की सरकारी व्यवस्था बनाती और नियंत्रित करती है। चलिए आज रुपये की खोज पड़ताल करते हैं.... रूपया, रुपया, रुपया आखिर क्या बवाल है यह रुपया :)   

रुपये या नोट की कीमत आखिर बनती कैसे है?

किसी भी अमेरिकी डॉलर के नोट पर लिखा रहता है, "This Note is legal tender for all debts, public and private" और वहीं भारतीय नोट पर लिखा रहता है, "मैं धारक को रुपये अदा करने का वचन देता हूँ"। अब इसे समझने का प्रयास करते हैं। नोट मूल रूप से एक अंगरेजी शब्द है, जिसका अर्थ है ‘लिखित दस्तावेज़’। अब हमारे नोट पर लिखा हुआ वायदा दरअसल इस बात की पुष्टि करता है कि नोट धारक को इसे अदा करने की बैंक की वचनबद्धता (लिखित वायदा) है। आरंभिक काल में वस्तुओं के लेन देन के लिए करेंसी सिस्टम तो था नहीं तो एक वस्तु के बदले दूसरी लेने या देने का रिवाज़ ही था। बाद में इसको आसान करने के लिए धातु के सिक्के बनाये गए फिर धीरे धीरे इसमें अलग अलग प्रकार की धातुओं का इस्तेमाल होने लगा।भारत में भी शुरू में निजी बैंकों द्वारा बैंकनोट जारी किये जाने के क्रम में भी रुपया कहने का अर्थ सोने, चांदी के सिक्कों से था, जैसे कि एक तोला चांदी से बना सिक्का ‘एक रुपया’ कहलाता था, एक तोला सोना से बना सिक्का एक ‘मोहर’ कहलाता था और सोने की एक ‘मोहर’ का मूल्य सोलह रुपये था, आसान शब्दों में कहा जाए तो सोने के एक सिक्के (मोहर) के बदले चांदी के सोलह सिक्कों (रुपयों) का लेन-देन हो सकता था। कुछ दिनों तक तो मामला ठीक ठाक रहा लेकिन मामला द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गड़बड़ाने लगा। 





फिक्स्ड या फ्लोटिंग 

दुनिया में दो प्रकार के करेंसी रेट होते हैं: 
फिक्स्ड: जिसकी कीमत उस देश की सरकार तय करती है 
फ्लोटिंग: जिसकी कीमत बाज़ार तय करता है



















भारत आज़ाद के बाद से सन 1993 तक फिक्स्ड करेंसी रेट फॉलो करने वाला देश था लेकिन नरसिम्हाराव की सरकार ने इसे बाज़ार के हवाले करके एक ऐतिहासिक कदम उठाया था। उसके बाद भारत की करेंसी बाज़ार के हवाले हो गयी और भारत में निवेश सरल हो सका। मैं इस बात का कतई हिमायती नहीं हूँ लेकिन बाज़ार के हवाले करना शायद ज़रूरी हो गया था। राजीव गांधी की सरकार में भ्रष्टाचार, उसपर वी पी सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों का निष्क्रिय कार्यकाल और फिर विश्वव्यापी मंदी के बाद देश में पैसा लाने के लिए कुछ तो करना ज़रूरी था सो रुपये को बाज़ार के हवाले करके और निवेश के अनुकूल माहौल बनाकर पैसा जुटाने का प्रयास किया गया। 

रुपये की कीमत का गिरना  

आज़ादी के समय लगभग एक रूपए का एक डॉलर था और हम एक गरीब देश थे। आज़ादी के समय भारत की हालत खस्ताहाल थी लेकिन हम पर एक भी रुपये का विदेशी कर्ज नहीं था। एक रुपया एक पौंड और एक डॉलर के बराबर कीमत रखता था। हमारा रूपया सीधे तौर पर ब्रिटेन के पौंड से जुड़ा हुआ था और उसी से रेट कंट्रोल होता था। 

1951 में पहली बार विकास योजनाओं और विश्व बैंकों से पैसा जुटाने के प्रयास और अधिक फायदा उठाने के लिए रुपये का अवमूल्यन किया गया। 

1957 में एक रुपये की कीमत 100 नए पैसे रखी गयी। इसके पहले एक पैसा एक रुपये का चौसठवां हिस्सा था (1/64)। बाद में जब भारत ने दशमलव आधारित करेंसी को अपनाया तब इस नए पैसे को ही पैसा मान लिया गया। 

बहरहाल, भारत के बजट की हालत बहुत खस्ता थी और हम पूरी तरह से विदेशी कर्जे पर निर्भर थे, उसपर 1962 और 1965 के युद्धों ने भारत की कमर तोड़ दी थी। 1965 के युद्ध में भारत को किसी भी प्रकार का कोई विदेशी समर्थन नहीं मिला था उलटे पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान का समर्थन करते हुए भारत पर तरह तरह के आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए थे। भारत को मिलने वाली विदेशी सहायता बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। इस समय अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाये रखने के लिए फिर से रुपये का अवमूल्यन किया गया अब हमारा रूपया लगभग आठ रुपये प्रति डॉलर पर आ गया था। 

1971 में रुपये की कीमत को डॉलर से फिर 1975 में इसे जापानी येन और जर्मन मार्क के साथ जोड़ा गया। अब भारतीय मुद्रा की कीमत का फैसला इन तीनों मुद्राओं के ऊपर तय किया जायेगा ऐसा फैसला हुआ। 

बहरहाल हमारा विदेशी कर्ज बढ़ता गया और हम उसकी किश्त चुकाने के लिए कर्ज लेते रहे। 1985 आते आते रूपये की हालत 12 रुपये प्रति डॉलर हो गयी। 

हर देश की अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी कर्जे की समय पर अदायगी बहुत ज़रूरी होती है, यदि कर्जे के भुगतान का संकट हो जाए और यह भुगतान प्रभावित हो जाये तब उस देश की अर्थव्यवस्था टूट जाती है। ठीक यही हाल 1991 में भारत के सामने था। देश का विदेशी मुद्रा भण्डार सिर्फ तीन हफ्ते के लिए था, कर्जे की अदायगी का कोई रास्ता नहीं था और हम दिवालियेपन की कगार पर खड़े थे। 

इस समस्या से निपटने के लिए नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह ने मुद्रा का फिर से अवमूल्यन किया और अब लगभग 18 रुपये प्रति डॉलर के हिसाब से रेट तय हुआ। अब तक भारत डॉलर, येन और मार्क के बास्केट की बड़े ट्रेडिंग पार्टनर के द्वारा आये मूल्य पर आधारित था लेकिन 1993 आते आते इसे बाज़ार के हवाले कर दिया गया। अब रुपये की कीमत बड़े मार्किट मेकर, औद्योगिक घराने, बैंक, औद्योगिक निवेशक, विदेशी निवेश और सकल घरेलु उत्पाद, मुद्रास्फीति जैसे कई फैक्टरों पर निर्भर करने लगी। बाज़ार के हवाले होने के बाद और निवेश के लिए उचित माहौल बन जाने के बाद मुद्रा का अवमूल्यन बहुत तेज़ी से हुआ और 1999 आते आते लगभग चालीस, बयालीस रुपये प्रति डॉलर तक हो गया। 

2000 के बाद वाजपेयी सरकार ने रुपये का अवमूल्यन रोकने के लिए निवेश को आधार बनाया, विदेशी निवेश में अपार वृद्धि और निवेश के लिए उचित माहौल, विदेशी घरानों को भारत में एक बहुत बड़ा बाज़ार दिखा और उसे भारत में निवेश के लिए माहौल मिला। इसका फायदा यह मिला की रूपये का गिरना बंद हुआ और रुपया मजबूत होकर स्थिर हुआ। 2004 में यूपीए-1 ने वाजपेयी की नीति का ही अनुसरण किया और 2007 में 39 रुपये प्रति डॉलर की स्थिति सुधरी जो 48 रुपये तक बिगड़ी थी। इसमें एक बात ध्यान देने योग्य है कि 1998 के पोखरण परीक्षण के बाद विश्व द्वारा लगाए गए प्रतिबन्ध असल में बड़े देशों पर ही भारी पड़ गए थे और वह प्रतिबन्ध हटाने को मजबूर हो गए थे । 

2008 के विश्वव्यापी आर्थिक संकट ने निवेशकों को भारत से अपना पैसा निकालकर अपने मूल देश ले जाने पर मजबूर किया, संस्थागत निवेशकों ने जबरदस्त बिकवाली की और हमारा रुपया फिर टूटना शुरू हुआ। बाज़ार अनुकूल न था और सरकारी नीतियां नाकाफी थी। ऊपर से यूपीए-2 का भ्रष्टाचार, निवेश के लिए प्रतिकूल माहौल, बैंकों की नीति का साफ़ न होना और जबरदस्त बढ़ती हुई मुद्रास्फीति ने रुपये को तोड़ दिया। 2007-2013 तक रुपये ने अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। 15 मई 2014 को मनमोहन सरकार ने जाते जाते रुपये को साठ रूपए प्रति डॉलर तक पहुंचा दिया। 

फ्लोटिंग करेंसी रेट के लिए कारक: 

जब पैसा बाज़ार के हवाले कर दी जाती है तब बहुत से फैक्टर आ जाते हैं। भारत मैनेज्ड फ्लोट करेंसी रेट को फॉलो करने वाला देश है। इसके अंतर्गत विश्व की अर्थव्यवस्था किसी भी जुड़े हुए देश के ट्रेड बैलेंस पर निर्भर कर सकती है। आईएमएफ के अनुसार लगभग 82 देश इस सिस्टम से जुड़े हुए हैं। 

दुनिया की सबसे शुद्ध फ्लोटिंग करेंसी कैनेडा के डॉलर की है और दुसरे नंबर पर अमेरिकी डॉलर है। 1970 तक करेंसी के रेट के लिए ब्रेटन वुड्स सिस्टम का पालन होता था लेकिन 1971 में अमेरिका ने एक डॉलर के एक्सचेंज रेट यानि की 1/35 औंस सोना = 1 डॉलर के लॉजिक को मानने से इंकार किया और इसे फिक्स्ड करने की जगह वेरिएबल किया। अब डॉलर बाज़ार के हवाले था लेकिन ठीक इसी समय स्मिथसोनियन समझौते को आधार मानकर विश्व के लगभग सभी वित्तीय लेन देन करने वाले देशों ने (मध्य पूर्व और खाड़ी देशों सहित) अपना रेट उस मुद्रा के साथ फिक्स्ड कर दिया जो बहुत ज्यादा गिरी या उछली नहीं थी। इसका सीधा फायदा अमेरिकी डॉलर को मिला और लगभग सभी वित्तीय समझौते अमेरिकी डॉलर में किये जाने लगे। 

इस फ्लोटिंग करेंसी रेट को फॉलो करने का सबसे बड़ा नुकसान विकासशील देशों को है। यह उन कारकों पर निर्भर करता है जिन पर उस देश का बहुत हद तक नियंत्रण है ही नहीं। 

- डॉलर पर निर्भरता 
- आर्थिक भंगुरता 
- अर्थव्यवस्था पर बड़े झटके 

यदि किसी भी देश को अपने देश की मुद्रा का अवमूल्यन रोकना है तो फिर उसे कई कारकों को नियंत्रण में रखना होगा। 

1. मुद्रास्फीति 
2. निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार 
3. सकारात्मक माहौल 
4. कर्ज और ब्याज की तय समय पर अदायगी 
5. सकल घरेलु उत्पाद
6. खरीद शक्ति समानता (Purchase power parity)

याद रखिये यदि निवेश आधारित नीतियां होंगी तब रूपया बाज़ार के हवाले ही रहेगा। यह नीति अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए मनमोहन सिंह लेकर आये और उसे ठीक तरीके से चलाया अटल बिहारी वाजपेयी ने और उसे फिर से पटरी से उतार दिया मनमोहन सिंह साहब से और अब मोदी के पास उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए गंभीर चुनौती है। अगर मैं फ्लोट करेंसी बास्केट के आधार पर अन्य मुद्राओं के अवमूल्यन की बात करूँ तो हम आज भी काफी मजबूत स्थिति में हैं। 2016 में अगर बड़े बैंकिंग समूहों की मानें तो रुपये में स्थिरता बनी रहेगी और निवेशकों के लगातार और स्थिर निवेश की स्थिति में इसमें सुधार की सम्भावना रहेगी। फिलहाल बाज़ार के समीकरण सरकार के साथ हैं लेकिन उन्हें अपनी नीतियों के पालन के लिए मजबूती से डटे रहना होगा। विपक्ष के बॉयकॉट करने जैसी स्थिति, कानून पारित कराने में सरकार की अक्षमता जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं जिनसे निवेशकों की नज़र में क्षवि कमजोर होती है और इसके भी विपरीत परिणाम होते हैं।

(एबीएन एमरो के मार्किट रिसर्च डेटा के अनुसार) 

(क्रेडिट सुइस के अनुसार) 

इन्वेस्टमेंट बैंक, मार्किट मेकर और रुपया 

भारतीय रुपया दुनिया भर के मार्केट मेकर और बड़े इन्वेस्टमेंट बैंकों के लिए प्रमुख फोरेक्स ट्रेडिंग इंस्ट्रूमेंट नहीं है, और वह आज भी डॉलर, पौंड, येन, यूरो, ऑस्ट्रेलियन डॉलर, येन और नॉर्वे क्रौन को ही अपने बास्केट में रखते हैं। विश्व में फोरेक्स आज सबसे ज्यादा ट्रेड होने के बावजूद उसमे रुपये का योगदान मुश्किल से एक प्रतिशत है और उस मामले में हम दुनिया में बीसवें पायदान पर हैं। हांगकांग डॉलर, सिंगापुरी डॉलर, टर्किश लीरा और कोरिया का वोन भी रुपये से ज्यादा ट्रेड होता है।  

दुनिया में सबसे बड़े फोरेक्स इलेक्ट्रॉनिक एक्सेक्यूशन वेन्यू में कोई भी भारतीय नहीं है। 


बहरहाल फिलहाल सरकार का समर्थन किया जाना चाहिए क्योंकि उसके इरादे एकदम साफ़ हैं और देशहित में हैं। आई एम ऍफ़ की रिपोर्ट को माने तो अगले दशक तक भारत के पास विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता है और आतंरिक विरोधाभास में घिरे हुए देश को पटरी पर लाने की ज़िम्मेदारी हम सभी की है। इसमें ज़िम्मेदारी सभी की है, मीडिया, राजनैतिक दल देश की जनता, एनआरआई, सोशल मीडिया के क्रन्तिकारी सभी लोग इसमें सकारात्मक सहयोग दें। व्यर्थ की नकारात्मकता को हवा देकर आप अपना ही नुकसान कर बैठेंगे। 

चलिए आज के लिए इतना ही, फिर मिलेंगे किसी और मुद्दे के साथ। 

जय हो

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

जय बिहार

क्या कभी आपने सोचा है कि बेरोजगारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, सुखा और लोगों का जत्थे से जत्थे में हो रहे पलायन, इत्यादि समस्यायों से घिरे राज्य बिहार का भारत के प्राचीन परम्परा से लेकर आजतक क्या योगदान रहा है? जनक, जरासंध, कर्ण, सीता, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, मनु, याज्ञबल्कय, मण्डन मिश्र, भारती, मैत्रेयी, कात्यानी, अशोक, बिन्कुसार, बिम्बिसार, से लेकर बाबू कुंवर सिंह, बिरसा मुण्डा, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, रामधारी दिन्कर, नार्गाजून और न जाने कितने महान एवं तेजस्वी पुत्र एवं पुत्रियों को अपने मिट्टी में जन्म देकर भारत को विश्व के सांस्कृतिक पटल पर अग्रणी बनाने में बिहार का सर्वाधिक स्थान रहा है। आज भी देश को सबसे अधिक आईएएस, पीसीएस ऑफिसर देने वाला राज्य बिहार ही है। फिर आज बिहार विश्व का सबसे गरीब राज्य क्यों है? बिहार की जीडीपी भारत की कुल जीडीपी का दसवां हिस्सा भी नहीं हैं और विकास दर २८% होने के बाद भी वह भारत के राष्ट्रिय औसत से कहीं पीछे है और स्थिति सुधरती दिख भी नहीं रही।
भारत के राष्ट्रीय राजनीति से काफी अलग है बिहार और यहाँ स्थिति बहुत बुरी तरह से उलझी हैं। जाति के कुचक्र में उलझा बिहार आज भी उस उहापोह की स्थिति से बाहर नहीं निकल पाया। आज भी विपक्षी जाति के ध्रुवीकरण के लिए उलटे सीधे पैतरे आज़मा रहे हैं। इस बार का चुनाव असल में बिहार की परीक्षा है। देखना होगा कि बिहार क्या फैसला लेता है। वैसे मेरा मानना है कि लोकतंत्र में जनता हमेशा सही फैसला देगी यह सच नहीं, 2004 में कांग्रेस की वापसी जनता की विफलता थी। बहुसंख्यक समाज का वोट से दूर रहना और सिर्फ पचास फीसदी वोट ने कांग्रेस की वापसी करा दी थी। 2015 में दिल्ली चुनाव में इमाम के फतवे से पूरा मुस्लिम वोट बैंक आआपा को शिफ्ट होने से भाजपा बुरी तरह परास्त हुई थी। मुझे उम्मीद है कुछ वैसा ही बिहार चुनाव में भी होगा, जाति समीकरण की जोड़ तोड़ या फिर विकास, देखते हैं बिहार किसे चुनता है। यदि लालू या नितीश की वापसी होती है तो मुझे घनघोर निराशा होगी। इसलिए नहीं कि मैं बिहारी हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं जानता हूँ कि बिहार की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ बिहार ही है। जातिवाद के घनघोर चक्रव्यूह में घिरे हुए मानस पर विकास की बयार कैसे आएगी देखना होगा।
कल न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर पर लिट्टी पर चर्चा के कार्यक्रम के दौरान मैं यहाँ के बिहारी समुदाय से मिलकर इस पर चर्चा करने का प्रयास करूँगा और देखते हैं इसका क्या परिणाम निकलता है। आपको बताऊंगा कल की खबर…
फ़िलहाल अभी के लिए नमस्कार.... जय भारत और जय बिहार।
---न्यूयॉर्कर बिहारी

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

अप्रवासी की चाय....

विदेश में किसी भारतीय को कुछ चीज़ों में झिझक होती है, ख़ास तौर पर शाकाहारी और सिगरेट शराब से दूर रहने वाले व्यक्ति को। बच्चन जी ने कहा था कि व्यसन या नशे के दोस्त बड़े पक्के होते हैं। सच ही है, पीने पिलाने वाले लोगों का बहुत जल्दी बड़ा ही गजब सा फ़्रेंड सर्कल बन जाता है। हम जैसे लोग जो सिर्फ़ काम से काम रखते हैं, मजबूरी या फिर मजदूरी की श्रेणी में गिने जाते हैं। आज कल मेरे मैनेजर मुझे प्रमोट करते हैं कि मैं ऐसी मीटिंग्स में जाऊँ और लोगों से बात करके अपना दायरा बढ़ाऊँ। सिर्फ़ काम करने से तरक़्क़ी नहीं होगी का मंत्र देते हैं। अब भाई हम तो उस सभा, मीटिंग या कार्यक्रम में कभी नहीं जाते जहाँ के चीफ़ गेस्ट हम नहीं हैं। मैं ऑफ़िस में इवेंट्स के नाम पर होने वाली लाखों करोड़ों की बर्बादी के हमेशा ख़िलाफ़ रहा हूँ। भारत जैसे देश में जहाँ आज भी उन्नीस करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं वहाँ ऐसे पैसे बरबाद करना मुझे तर्क संगत कभी न लगा।

असल जीवन में, मैं फ़ाइव स्टार की बर्बादी की जगह चाय की एक प्याली को ज़्यादा महत्त्व दूँगा। अगर उसमे प्यार है, अपनापन है तो फिर वह अमृत है। उसकी तुलना में पाँच सितारा की पार्टी छलावा है। मैं कई साल पहले कई बार रायगढ़ के एक गाँव में यूँ ही चला जाता था और बच्चों को स्कूल में पढ़ते पढ़ाते देखता। एक मास्टर साब मुझे चाय पिलाते और मैं उनको हिंदी पढ़ाता। मराठी माध्यम होने के कारण उनका हिंदी ज्ञान कमज़ोर था और वह मुझसे सीखने में ज़रा भी नहीं कतराते थे। मैं भी पूरा सम्मान देकर उन्हें अपना समय देता था। धीरे धीरे समय बदला, लोग बदले और हम भी बदल गए। बीते दस सालों में हमने चाय की वजह से कई दोस्त बनाए हैं। पुराने ब्लॉगरों को मेरी चाय प्रेम की कविताएँ शायद अभी भी याद होंगी। बहरहाल अब हम चाय की प्याली ले आए हैं और मनीषा के साथ बालकनी में चाय का मजा ले रहे हैं।


जो कोई भी आना चाहे स्वागत है, मेरे यहाँ हर कोई चीफ़ गेस्ट ही है।