मंगलवार, 22 मई 2012

सांड और इंसान......

अबे कायदे और कानून केवल इंसानों के लिए हैं, या जानवरों के लिए भी?.... अब भाई एक अजीब वाक्या हो गया शहर में मुख्य चौराहे पर.... बस स्टाप पर सारे बुद्धिजीवी एसी बस के इंतज़ार में खडे थे, कुछ नें तो कान में एकदम घुसेड के हेडफ़ोन पर कानफ़ाडू संगीत भी बजा रखा था, और कुछ अखबार लेके ना जानें कहां कहां की चिन्ता ले के माथा फ़ोडे हुए थे.... और हम.... हम ठहरे ब्लागर सो चुप्पे से स्थिति का जायजा लेने मे व्यस्त थे... लेकिन तभी...... 

ना मालूम कौन से लोक से एक सांड प्रकट हो गया, वह भी एकदम क्रोधित मुद्रा में.... अबे एकदम भगदड जैसी मच गई बस स्टाप पर.... जो कान में हेडफ़ोन घुसेडे थे वह फ़ोन फ़ेक के भागे और बुद्धिजीवी अखबार फ़ेंक के.... सांड भाई नें पहले बस स्टाप खाली कराया और फ़िर बस स्टाप पर चुप्पे से खडा हो गया... मुझे लगा बस पकडनें ही आया था। ना हिलता और ना डुलता.... एकदम मूर्ति बन के खडा था अपना सांड भाई.... बस आई लेकिन कोई चढ ही न पाया.... बस स्टाप पर बस ड्राईवर नें सांड को खडा देखा तो थोडा पीछे ही बस को रोका... लेकिन कोई चढ न पाया... जब तीन चार बसें निकल गई तो फ़िर किसी नें बोला... अरे कोई इस सांड को निकलवाओ.... इसनें तो नाक मे दम कर रखा है.... क्या किया जाए.... हम कहे अबे सांड ही तो है, बनारस में तो हर चौक पे इन्ही के दर्शन होते हैं.... और ई त मुम्बईया सांड है, इसको भी लोगों की आदत होगी... कुछ नहीं होगा.... हिम्मत जुटा के साहब हम आगे बढे और हमारी पूंछ पकड के बाकी लोग.... बस स्टाप पर अब सांड और सांड के साथ सारे लोग..... अब लगा की लोग और सांड बस पकडनें के लिए खडे हैं.... अपना सांड भाई अभी भी मूर्ति बन के खडा है.... बस आई.... अपनें हिन्दुस्तानी भाई लगे धक्कम पेल में.... सबको गिरा लुढका के बस में सबसे पहले सवार होनें के लिए लगे धकियानें.... लेकिन इस हरकत से सांड भाई नाराज़ हो गया..... लगा बस के दरवाज़े पर अपना गुस्सा निकालनें..... जहां लोगों की भीड थी वहां फ़िर से सन्नाटा था.... ना सांड चढा और ना लोग.....  

अबे सांड को लगा पहले वह चढेगा लेकिन अपनें यहां न सांड कायदे कानून जानते हैं और न लोग.... लगे धक्कम पेल मचानें.... अगर कायदे से लाईन लगा के चढे होते तो न सांड गुस्साया होता और न लोग गिरे पडे होते..... बहरहाल थोडी देर बाद सांड को खोजते दो चार गुंडे टाईप लोग आये और उन्होनें कोई आधे पौन घंटे की मश्शकत और जोर आज़माईश के बाद सांड को काबू किया.....   

अजब देश है भाई, बस स्टाप पर इंतज़ार करते समय बुद्धिजीवी बनें रहते हैं, कान में हेडफ़ोन घुसेडे रहते हैं... लेकिन बस में चढनें के टाईम धक्कम पेल मचा के सबको गिराते धकियाते हुए चढते हैं..... अब ऐसे में  तो कम से कम सांड भाई का सनकना जायज़ ही था न.....

8 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

पूरे मामले की जानकारी के बाद तो सिर्फ 2 ही लोग कायदे और कानून के मुरीद लगे ... एक तो जाहीर है आप ही है ... दूसरे अपने ...सांड भाई ... ;-)

सदा ने कहा…

बहुत सही

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - तीन साल..... बाप रे बाप!!! ब्लॉग बुलेटिन

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

साड़ों से सब घबराते हैं..

V.P. Singh Rajput ने कहा…

ब्लाग पर आना सार्थक हुआ । काबिलेतारीफ़ है प्रस्तुति । बहुत सुन्दर बहुत खूब...बेहतरीन प्रस्‍तुति
हम आपका स्वागत करते है..vpsrajput.in..
क्रांतिवीर क्यों पथ में सोया?

Ramakant Singh ने कहा…

BEAUTIFUL NARRATION .SO NICE.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

सुन्दर चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

S.N SHUKLA ने कहा…

ख़ूबसूरत प्रविष्टि , बधाई.

कृपया मेरी नवीनतम पोस्ट पर भी पधारने का कष्ट करें , आभारी होऊंगा