गुरुवार, 8 सितंबर 2016

अनजान रास्तों पर पूरे कॉन्फिडेंस के साथ:-2

आज तक हम तकनीक पर बहुत हद तक निर्भर होते जा रहे हैं और असल में आज की ज़रूरत भी है, मैं पिछले पोस्ट की ही शृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज जीपीएस और सैटेलाइट नेविगेशन के बारे में बताना चाहूंगा। सेटेलाइट नेविगेशन या उपग्रह नौ-वहन प्रणाली (SATNAV) एक ऐसा सिस्टम है जो उपग्रहों के माध्यम से पृथ्वी पर स्थित किसी भी बिंदु के निर्देशांक को निर्धारित कर सके। इसमें एक इलेक्ट्रॉनिक रिसीवर उपग्रहों के माध्यम से अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई की गणना कर सकता है। आज कल तो यह सिस्टम स्थानीय समय की भी गणना कर सकने में सक्षम हैं। 

अप्रैल 2013 तक इस क्षेत्र में अमेरिका और रूस अकेले ही बादशाह थे और NAVSTAR GPS (अमेरिका) और GLONASS (रूस) के उपग्रह और तंत्र विश्व भर की ज़रूरत पूरी करते थे। चीन और भारत ने अपने अपने तंत्र बनाने की दिशा में बहुत तेज़ी से कदम बढ़ाये हैं और अब चीन का BDS (BeiDou Navigation Satellite System) और भारत का गगन (GPS Aided GEO Augmented Navigation) दोनों बहुत जल्दी इस मामले में अमेरिकी और रूसी बादशाहत को चुनौती देते हुए नज़र आएंगे। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमारा ब्रम्होस शुद्ध देसी इसी गगन नेविगेशन प्रणाली पर चलेगा और उसकी विश्व के किसी अन्य देश की प्रणाली पर कोई निर्भरता नहीं होगी। जल्दी ही हमारा खुद का नेविगेशन तंत्र NAVIC (Navigation with Indian Constellation) तैयार हो जायेगा और एयरपोर्ट अथॉरिटी (हमारा घरेलु नागर विमानन), वायु सेना, थल सेना और नौसेना पूरी तरह से देसी नेविगेशन प्रणाली पर चलेगी।

चलिए थोड़ी जानकारी लेते हैं इन सभी प्रणालियों की:

1. GPS: इसे आप अमेरिकी प्रणाली कह सकते हैं और इस प्रणाली में ३२ मध्य भू कक्षा (अंतरमाध्यमिक वृत्ताकार कक्षा) में पृथ्वी के चक्कर लगाते हुए उपग्रहों पर आधारित प्रणाली कह सकते हैं। यह सभी उपग्रह छः अलग अलग ऑर्बिटल प्लेन में हैं और समय समय पर अमेरिका ने उन्हें अपग्रेड किया है। यह आज भी विश्व का सबसे ज्यादा प्रयोग में होने वाली प्रणाली है। 

जीपीएस उपग्रह 

2. GLONASS: यह सोवियत संघ द्वारा बनाया और अब रूस द्वारा संचालित प्रणाली है जो पहले सिर्फ रूसी सेना के प्रयोग में आता था और अब यह सिविलियन के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। इसमें २४ GLONASS उपग्रहों के जरिये पूरी दुनिया में नेविगेशन सुविधा दी जा सकती है।

रूस के गो-नेट और ग्लोनास 
3. BDS: यह चीन द्वारा विकसित किया जा रहा नेविगेशन सिस्टम है जिसका एक चरण (१० उपग्रहों का) अब पूरा हो चुका है और यह जल्दी ही पूरी दुनिया का कवरेज दे पायेगा। 

इसके अलावा चीन यूरोपियन यूनियन द्वारा विकसित किये जा रहे गैलीलियो में भी सक्रिय रूप से लगा हुआ है। 

चीन का बीडीएस 


4. GAGAN और IRNSS: यह भारत में इसरो, एयरपोर्ट अथॉरिटी के द्वारा मिल जुल कर बनाया गया सिस्टम है जिसके जरिये अब भारत में तीन मीटर तक की दक्षता पाई जा सकती है। इसके जरिये विमानों के परिचालन में बहुत सहायता होगी। भारत ने नेविगेशन के लिए प्रणाली शुरू कर दी है और इस श्रृंखला में सात में से पहला उपग्रह छोड़ा जा चुका है। 

गगन 
---------------------------------------------

मुझसे अक्सर लोग यह प्रश्न पूछते हैं कि गाड़ी चलाते समय या नेविगेशन के लिए डेडिकेटेड डिवाइस लें या फिर मोबाइल से काम चलाएं? मित्रों आइये आपको इसका अंतर समझाने का प्रयास करता हूँ। 

डेडिकेटेड डिवाइस जैसे कि गार्मिन प्री-लोडेड नक़्शे के साथ कोई डेढ़ सौ डॉलर का मिलता है और आप उसे अपने डैशबोर्ड पर माउंट करके बेसिक नेविगेशन की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। अब आपका कौन सा डिवाइस किस प्रकार के उपग्रह से डेटा पॉइंट ले सकता है वह उसके मैनुअल में समझना होगा। ज्यादातर डिवाइस केवल अमेरिकी सेटनैव या जीपीएस को ही समझते हैं और उनमे कम्पास या खुद से दिशा का आंकलन करने की क्षमता नहीं होती। सो अगर आप किसी फ्लाई-ओवर के नीचे हैं और आपके डिवाइस को सही डेटा नहीं मिला तो वह आपको जानकारी नहीं दे पायेगा। कुछ ही डिवाइस ऐसे हैं जो दिशा समझ सकते हैं और उसके हिसाब से आपके नक़्शे को ठीक ओरिएंटेशन में रख सकते हैं। 

अब बात करते हैं मोबाइल फोन की तो यहाँ बहुत विकल्प हैं, लगभग सभी स्मार्ट फोन में अमेरिकी जीपीएस को समझ सकने की क्षमता है और अब आई-फोन-७ में रूसी ग्लोनास का रिसीवर आएगा लेकिन अभी आई-फोन सहित लगभग सभी कम्पनियाँ सैमसंग से काफी पीछे हैं। सैमसंग के नए नोट-७, एज-६, एज-७ सभी हैंडसेट जीपीएस के अलावा ग्लोनास, बीडीएस, गैलीलियो इन सभी से डाटा कलेक्ट कर पाएंगे सो यह फोन किसी भी डेडिकेटेड डिवाइस से बेहतर काम करेंगे। इन सभी फोन में मेग्नेटिक सेंसर और कंपास है और इनमे दिशा को पहचान सकने की क्षमता है। रही बात नक़्शे की तो आप प्ले-स्टोर से बहुत से मुफ्त या बड़ी ही मामूली कीमत कर मैप सॉफ्टवेयर इनस्टॉल कर सकते हैं। 

मेरे अनुभव से मोबाइल डिवाइस किसी भी अन्य जीपीएस डिवाइस से बेहतर हैं और वह सही मायने में स्मार्ट हैं। जीपीएस डिवाइस या आपके कार का नेविगेशन सिस्टम सिर्फ दिखाने के लिए ठीक है क्योंकि वह बौड़म है और उसे आस पास हो रही घटनाओं की जानकारी नहीं। इसलिए सबसे बेहतरीन है गूगल का मैप जो रियल टाइम ट्रैफिक की जानकारी देता है और आप इसको इस्तेमाल करते समय अपने रुट की पूरी जानकारी रख सकते हैं, रास्ते में लिए गए फोटो गूगल फोटोज अपने आप ही मैप पर टैग कर देता है सो आप समझ सकते हैं की आपने कौन सा फोटो कब और कहाँ लिया है। एप्पल के मैप ने मुझे पिछले कुछ दिनों से थोड़ा बहुत इम्प्रेस किया है लेकिन अभी भी वह गूगल के सामने बच्चा ही है। 

यह देखिये आज की ड्राइव के बाद का चित्र 
थोड़े से जजमेंट से आप अनजान रास्तों पर बड़ी ही आसानी से यात्रा कर सकेंगे और पार्किंग, पर्यटन स्थल, पेट्रोल पम्प, होटल, ट्रैफिक की दुर्घटना, ट्रैफिक जाम और लेन गाइडेंस जैसे कई सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे। सो इसलिए सही बात को समझते हुए अपनी जरुरत के हिसाब से सही विकल्प का चुनाव कीजिये। 

इस पोस्ट में मैंने प्रयास किया कि आम बोलचाल की भाषा में इसे समझा जा सके, यदि किसी को कोई शंका हो या कोई और प्रश्न हो तो बेझिझक संपर्क करें। 

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'दो सितारों की चमक से निखरी ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भूली-बिसरी सी गलियाँ - 8 “ , मे आप के ब्लॉग को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !